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यूजीसी समानता नियम: उच्च शिक्षा में भेदभाव पर उठे सवाल

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने हाल ही में ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशन, 2026’ नाम से एक नोटिफिकेशन जारी किया। इन यूजीसी समानता नियम का प्राथमिक उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान, नस्ल या दिव्यांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करना है। हालांकि, इन नियमों ने तत्काल व्यापक विवाद को जन्म दे दिया है, विशेषकर सामान्य वर्ग के छात्रों के बीच।

छात्रों और कई विशेषज्ञों का मानना है कि इन नियमों में उन्हें पहले से ही अपराधी मान लिया गया है, जिससे उनके अधिकारों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी है, जो इस मुद्दे की गंभीरता को दर्शाता है।

यूजीसी समानता नियम: क्यों उठे विवाद के स्वर?

इन नियमों को लेकर सबसे बड़ी चिंता यह है कि इनमें शिकायत की सत्यता जांचने या झूठी शिकायतों को छांटने का कोई ठोस प्रावधान नहीं किया गया है। जहां प्रत्येक आरोप पर तुरंत समिति बैठाकर तेज कार्रवाई का प्रावधान है, वहीं साक्ष्य की परख, गवाहों की सुनवाई, गोपनीयता और अपील जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है।

संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी?

भारत के संविधान का अनुच्छेद-14 समानता के अधिकार की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 15(1) जाति, धर्म आदि के आधार पर भेदभाव को रोकता है। विशेषज्ञों का तर्क है कि यूजीसी समानता नियम अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकारों की अनदेखी करते हैं। यदि कोई शिक्षक या छात्र जो अनुसूचित जाति, जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग में नहीं आता है और उसे जाति आधारित भेदभाव का सामना करना पड़ता है, तो उसके पास बचाव का कोई स्पष्ट कानूनी प्रावधान नहीं है, जो एक प्रकार का प्रक्रियात्मक अन्याय है। नियम दो वंचित समूह के खिलाफ भेदभाव मिटाने की बात करता है, वहीं नियम तीन (सी) न्याय के अधिकार को केवल कुछ जातियों तक सीमित कर देता है।

मसौदे से अंतिम नियमों तक का सफर

फरवरी 2025 में, यूजीसी ने नियमों का मसौदा संस्करण सार्वजनिक सुझावों के लिए जारी किया था। उस मसौदे में अन्य पिछड़ा वर्ग को जाति आधारित भेदभाव के दायरे से बाहर रखा गया था। इसके अतिरिक्त, मसौदा नियमों में यह भी प्रस्ताव था कि भेदभाव की झूठी शिकायतों को हतोत्साहित किया जाए और इसके लिए जुर्माने का प्रावधान रखा गया था। हालांकि, अंतिम अधिसूचित नियमों में झूठी शिकायतों से संबंधित यह महत्वपूर्ण प्रावधान हटा दिया गया, जिससे दुरुपयोग की आशंका बढ़ गई है।

अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण 2021-22 के अनुसार, उच्च शिक्षा में 60% विद्यार्थी आरक्षित वर्ग से थे। ऐसे में यह भी बड़ा सवाल है कि यदि इन परिषद विद्यार्थियों में ही कोई किसी का जाति आधारित भेदभाव करता है तो क्या होगा? इस पर ये नियम मौन हैं। जिस प्रकार अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 और दहेज उत्पीड़न विरोधी धारा-498 ए के तहत कई बार झूठे या गलत मामले दर्ज कराए गए हैं, और निर्दोष फंसे हैं, वैसा ही खतरा इन यूजीसी समानता नियम में भी दिख रहा है। स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इनके दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए गिरफ्तारी से पहले प्राथमिक जांच सुझाए थे।

अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य और समानता का वास्तविक अर्थ

विश्व के प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में विविधता और समानता के सिद्धांत अपनाए गए हैं, लेकिन निष्पक्षता पर विशेष जोर दिया जाता है।

समता का वास्तविक अर्थ सभी के साथ न्याय है। एक कमजोर को ताकत देकर दूसरे को कमजोर करना समाधान नहीं। सभी को साथ लेकर चलना ही उचित रास्ता है। भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है, जहां कानून सबके लिए बराबर होता है। यह हमारे संविधान का मूल भाव है। अगर कहीं सामान्य वर्ग के छात्र के साथ गलत हो रहा है, तो उसे भी न्याय मिलना चाहिए। ऐसा परिवेश बनाने पर भी काम हो, जहां शिकायत की नौबत कम आए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1: यूजीसी के समानता नियमों का मुख्य उद्देश्य क्या है?

यूजीसी समानता नियम का मुख्य उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान, नस्ल या दिव्यांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करना है।

Q2: इन नियमों पर क्या विवाद उत्पन्न हुआ है?

मुख्य विवाद झूठी शिकायतों की जांच के लिए ठोस प्रावधानों की कमी और सामान्य वर्ग के छात्रों द्वारा अपने अधिकारों के हनन की आशंका से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इन पर रोक लगा दी है।

Q3: क्या यूजीसी समानता नियम सभी छात्रों पर समान रूप से लागू होते हैं?

नियमों का इरादा सभी के लिए समानता सुनिश्चित करना है, लेकिन आलोचना यह है कि प्रक्रियात्मक रूप से ये सभी छात्रों, विशेषकर गैर-आरक्षित वर्ग के, के लिए समान सुरक्षा प्रदान नहीं करते हैं, जिससे न्याय के अधिकार केवल कुछ समूहों तक सीमित हो सकते हैं।

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