भारतीय सेना के आधुनिकीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए, अब स्वदेशी एके-203 राइफल का पूरी तरह से स्वदेशीकरण हो चुका है। कानपुर की स्मॉल आर्म्स फैक्ट्री (एसएएफ) में निर्मित यह अत्याधुनिक असॉल्ट राइफल एक मिनट में 600 गोलियां दागने की क्षमता रखती है। यह राइफल पहले रूस के सहयोग से बनाई जा रही थी, लेकिन अब इसमें शत-प्रतिशत भारतीय पार्ट्स और तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो आत्मनिर्भर भारत की एक बड़ी उपलब्धि है।
स्वदेशी एके-203 राइफल: आत्मनिर्भर भारत की ओर एक कदम
भारत और रूस के संयुक्त उद्यम, आईआरआरपीएल (IRRPL), ने एके-203 राइफल के निर्माण की शुरुआत की थी। इस परियोजना का मुख्य लक्ष्य चरणबद्ध तरीके से राइफल का स्वदेशीकरण करना था। शुरुआत में, राइफल के 85% पार्ट्स रूस से आते थे और केवल 15% भारत में बनते थे। धीरे-धीरे यह अनुपात बदला और अब एके-203 को पूरी तरह से स्वदेशी पार्ट्स का उपयोग करके बनाया जा रहा है। रक्षा मंत्रालय की कानपुर स्थित एडवांस्ड वेपंस एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड की हथियार निर्माता ऑर्डिनेंस फैक्ट्री एसएएफ में इस राइफल के अधिकांश पार्ट्स बनते हैं, जबकि कोलकाता की राइफल फैक्ट्री ईसापुर में भी कुछ पुर्जे तैयार होते हैं। अमेठी में इनकी असेंबलिंग होती है।
परीक्षण और सेना को सौंपने की तैयारी
सेना को सौंपने से पहले, स्वदेशी एके-203 राइफल का तीन चरणों में सख्त परीक्षण किया जाएगा। पहला विंटर ट्रायल इसी फरवरी महीने में हिमाचल प्रदेश के सुमडो में होगा। इसमें सेना, एसएएफ और एके-203 को असेंबल करने वाली अमेठी की ऑर्डिनेंस फैक्ट्री प्रोजेक्ट कोरवा की टीमें मौजूद रहेंगी। गर्मी का परीक्षण राजस्थान में और बारिश का परीक्षण दक्षिण भारत में किया जाएगा। इन सभी परीक्षणों में सफल होने के बाद, यह राइफल भारतीय सेना का मुख्य हथियार बन जाएगी।
5 लाख से अधिक राइफलें होंगी तैनात
पहले चरण में, भारतीय सेना को 5 लाख से अधिक एके-203 राइफलें प्रदान करने की योजना है। इसमें से कई राइफलें पहले ही दी जा चुकी हैं, और अब जो राइफलें दी जाएंगी, वे पूरी तरह से स्वदेशी होंगी। वर्तमान में सेना के जवानों का मुख्य हथियार इंसास राइफल है, जिसे अगले 7 वर्षों में एके-203 से बदल दिया जाएगा। महाप्रबंधक सुरेंद्र पति ने इसे आत्मनिर्भर भारत मिशन की एक बड़ी उपलब्धि बताया है।
एके-47 से कितनी बेहतर है एके-203?
एके-203 असॉल्ट राइफल, एके-47 से कई मायनों में अधिक उन्नत है। इसकी मारक दूरी एके-47 से अधिक है, जो इसे युद्ध के मैदान में अधिक प्रभावी बनाती है।
स्वदेशी एके-203 राइफल की प्रमुख खासियतें:
- मैगजीन क्षमता: एके-47 की तुलना में एके-203 की मैगजीन क्षमता 30 राउंड की है।
- फायरिंग रेट: यह राइफल 1 मिनट में 600 राउंड फायरिंग करती है।
- मारक क्षमता: 400 मीटर की रेंज तक प्रतिशत सटीक प्रभावी फायर करती है।
- बट स्टॉक: इसका बट स्टॉक फोल्डिंग और एडजेस्टेबल है, जिससे इसे आसानी से ले जाया जा सकता है और विभिन्न स्थितियों में उपयोग किया जा सकता है।
- कारतूस: नाटो ग्रेड के 7.62 एमएम कारतूस का उपयोग होता है।
- नाइट विजन: पिकेटिनी रेल नाइट विजन सिस्टम से निशाना लगाना आसान होता है।
- वजन: राइफल का वजन 3.8 किलोग्राम है।
- लंबाई: स्टॉक मोड़ने पर इसकी लंबाई 690 मिलीमीटर है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न: स्वदेशी एके-203 राइफल का निर्माण कहाँ हो रहा है?
उत्तर: स्वदेशी एके-203 राइफल का निर्माण मुख्य रूप से कानपुर की स्मॉल आर्म्स फैक्ट्री (एसएएफ) में हो रहा है, जबकि अमेठी में इसकी असेंबलिंग की जाती है।
प्रश्न: एके-203 राइफल कितने समय में पूरी तरह स्वदेशी हुई है?
उत्तर: एके-203 राइफल का चरणबद्ध तरीके से स्वदेशीकरण किया गया है और अब यह शत-प्रतिशत स्वदेशी हो चुकी है।
प्रश्न: भारतीय सेना को कितनी एके-203 राइफलें मिलेंगी?
उत्तर: भारतीय सेना को पहले चरण में 5 लाख से अधिक एके-203 असॉल्ट राइफलें देने की तैयारी है।