मेडिकल कचरा निस्तारण: गंभीर चुनौतियाँ और समाधान
देश के अस्पतालों से प्रतिदिन लगभग 700 टन मेडिकल कचरा निकलता है, जिसमें से 140 टन कचरे का सही तरीके से निस्तारण नहीं हो पाता। यह अंबेडकर कचरा जल और वायु के माध्यम से पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है, जिससे मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ रहे हैं। विशेष रूप से, इससे एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है।

एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) का खतरा
एएमआर के प्रमुख कारणों में घरों में बची या एक्सपायर्ड एंटीबायोटिक दवाओं का गलत तरीके से निस्तारण, अस्पतालों से निकलने वाला बायो-मेडिकल वेस्ट और दवा फैक्ट्रियों से बिना उचित शोधन के बहने वाला दवा मिश्रित अपशिष्ट शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अस्पतालों में कचरा निस्तारण की कमजोर नीतियां और निगरानी की कमी इस समस्या को और भी गंभीर बना रही है।
भारत में मेडिकल कचरे की भयावह स्थिति
देशभर में लगभग 7 हजार सरकारी और निजी अस्पताल हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्रतिदिन लगभग 700 टन मेडिकल कचरा उत्पन्न होता है, जो सालाना लगभग 2.5 लाख टन होता है। अधिकांश कचरे का निस्तारण कामन बायो-मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट एंड डिस्पोजल फैसिलिटी (सीबीडब्ल्यूटीएफ) के माध्यम से किया जाता है, लेकिन 20% से अधिक कचरा अभी भी बिना उचित निस्तारण के रह जाता है। यह कचरा नदियों, झीलों और भूजल को दूषित कर रहा है। एंटीबायोटिक अवशेष जल स्रोतों में पहुंचकर मछलियों, कृषि उत्पादों और पेयजल के माध्यम से इंसानों तक पहुंचते हैं, जिससे न केवल संक्रमण फैलता है, बल्कि यह अवशेष बैक्टीरिया को अधिक प्रतिरोधी बना देते हैं, जिससे दवाओं का असर कम हो जाता है।
15% मेडिकल कचरा अत्यंत खतरनाक
रोज निकलने वाले कुल मेडिकल कचरे का 15% से अधिक हिस्सा ऐसा होता है जो सीधे संक्रमण, एएमआर और पर्यावरणीय जोखिम से जुड़ा है। इस खतरनाक कचरे में निम्नलिखित चीज़ें शामिल होती हैं:
- खून या शरीर के द्रव से सनी पट्टियां, कॉटन, गाज, ड्रेसिंग मटीरियल
- लैब सैंपल और कल्चर वेस्ट
- सुई, ब्लेड, कांच की शीशियां
- एंटीबायोटिक व अन्य दवाएं
- वैक्सीन व कीमोथेरेपी की दवाएं
मेडिकल कचरा निस्तारण के नियम और SOP
देश में मेडिकल कचरे के प्रबंधन के लिए ‘बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट नियम 2016’ लागू हैं। इन नियमों के तहत, एक्सपायर्ड या अप्रयुक्त एंटीबायोटिक और अन्य दवाओं को पीले रंग के नॉन-क्लोरीनेटेड प्लास्टिक बैग में एकत्र किया जाना चाहिए। घरों में बची एक्सपायर्ड एंटीबायोटिक दवाएं अधिकृत कलेक्शन सेंटर या केमिस्ट के माध्यम से जमा करनी चाहिए। इन्हें सामान्य कूड़े में फेंकना या नाली में बहाना पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों के लिए अत्यंत खतरनाक है। अस्पतालों में मेडिकल वेस्ट को विभिन्न रंगों में अलग किया जाना चाहिए और उनका वैज्ञानिक तरीके से उपचार किया जाना चाहिए।
निजी अस्पतालों में मनमानी और निगरानी का अभाव
दुर्भाग्य से, बायो-मेडिकल वेस्ट के निस्तारण में कई निजी अस्पताल संचालक मनमानी कर रहे हैं। इन अस्पतालों से निकलने वाले कचरे को सीधे सड़कों पर फेंका जा रहा है। जिला अस्पताल और उसके आसपास स्थित निजी अस्पतालों का हाल तो और भी बुरा है, जहाँ पॉलिथीन में भरकर इंजेक्शन व दवाओं की खाली शीशियां खुले में फेंकी जा रही हैं। अस्पतालों में रोजाना हजारों लोगों का आना-जाना रहता है, जिनके लिए यह स्थिति और भी घातक हो सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
- मेडिकल कचरा क्या होता है?
- मेडिकल कचरा अस्पतालों, क्लीनिकों, प्रयोगशालाओं और अनुसंधान केंद्रों से निकलने वाला वह वेस्ट होता है जिसमें मानव या पशु शरीर के हिस्से, दूषित सामग्री, एक्सपायर्ड दवाएं और तेज वस्तुएं शामिल होती हैं।
- मेडिकल कचरे का सही निस्तारण क्यों जरूरी है?
- सही निस्तारण संक्रमण के प्रसार को रोकने, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस को कम करने और पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाने के लिए आवश्यक है।
- घरों में बची या एक्सपायर्ड एंटीबायोटिक दवाओं का क्या करें?
- इन्हें सामान्य कूड़े में न फेंकें और न ही नाली में बहाएं। इन्हें अधिकृत दवा कलेक्शन सेंटर या अपने स्थानीय केमिस्ट के माध्यम से जमा कराना सबसे सुरक्षित तरीका है।