एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस: भोजन से शरीर तक पहुंच रहा खतरा

देश में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) अब केवल अस्पतालों और दवाओं की समस्या नहीं रह गई है। कृषि, पशुपालन, मुर्गी पालन और मत्स्य पालन में एंटीबायोटिक दवाओं के अत्यधिक और अनुचित उपयोग के कारण रेजिस्टेंस बैक्टीरिया कृषि उत्पादों और मांसाहार के जरिए भोजन की थाली तक पहुंच चुका है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया में बनने वाली हर तीन में से दो एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल इंसानों के इलाज के लिए नहीं, बल्कि दूध, मांस, अंडा और मछली का उत्पादन बढ़ाने में हो रहा है।

एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस: एक अदृश्य महामारी

एंटीबायोटिक का अंधाधुंध उपयोग एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस को एक अदृश्य महामारी बना रहा है। सामान्य संक्रमणों में इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक दवाएं धीरे-धीरे बेअसर होती जा रही हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि केंद्र सरकार को पशुपालन और मत्स्य पालन में इस्तेमाल हो रही 37 एंटीमाइक्रोबियल दवाओं पर प्रतिबंध लगाना पड़ा है। इनमें 18 एंटीबायोटिक, 18 एंटीवायरल और एक एंटी-प्रोटोजोन दवा शामिल है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने भी दूध, मांस, अंडा, पोल्ट्री और मत्स्य उत्पादन में एंटीबायोटिक दवाओं के उपयोग पर सख्त रोक लगाई है।

पर्यावरण पर गहराता खतरा

रेजिस्टेंस बैक्टीरिया पशुओं के सीधे संपर्क, उनके मल-मूत्र से दूषित मिट्टी और जल स्रोतों के माध्यम से भी फैल रहे हैं। यही वजह है कि एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस अब जल, जंगल, जमीन और पर्यावरण से जुड़ा एक गंभीर खतरा बन चुका है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और इंडियन नेटवर्क फॉर फिशरीज एंड एनिमल एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस से जुड़े विज्ञानियों का कहना है कि कमजोर जैव सुरक्षा, पशुओं की अनियमित चिकित्सकीय निगरानी और किसानों में जागरूकता की कमी इस संकट को और गहरा रही है।

भारत की स्थिति: वैश्विक तुलना में चिंताजनक

एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में पशु-पक्षियों पर प्रतिवर्ष करीब 3 हजार टन एंटीबायोटिक की खपत हो रही है। यहां प्रति किलो मांस उत्पादन पर औसतन 114 मिलीग्राम एंटीबायोटिक का उपयोग होता है, जबकि नॉर्वे जैसे देश में यह मात्र चार मिलीग्राम प्रति किलो है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार भारत सहित एशिया में पशु-पक्षी और मत्स्य पालन में एंटीबायोटिक का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। चेतावनी दी गई है कि यदि यही स्थिति रही तो 2040 तक केवल मत्स्य पालन में ही एंटीबायोटिक दवाओं की खपत 17,648 टन तक पहुंच सकती है।

मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंस बैक्टीरिया का बढ़ता प्रकोप

मेडिकल जर्नल ‘द लैंसेट’ और अन्य अध्ययनों में सामने आया है कि भारत के अस्पतालों में आने वाले लगभग 88 प्रतिशत मरीज मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस बैक्टीरिया के वाहक होते हैं। ‘द लैंसेट’ में प्रकाशित 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, यदि मौजूदा रुझान नहीं बदले तो 2025 से 2050 के बीच एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस से प्रतिवर्ष 3.9 करोड़ से अधिक मौतें हो सकती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  • एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस (AMR) क्या है?

    एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस वह स्थिति है जब बैक्टीरिया समय के साथ एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं, जिससे दवाएं संक्रमण को खत्म करने में अप्रभावी हो जाती हैं।

  • रेजिस्टेंस बैक्टीरिया भोजन से मनुष्य तक कैसे पहुँचता है?

    कृषि और पशुपालन में एंटीबायोटिक के अत्यधिक उपयोग से रेजिस्टेंस बैक्टीरिया जानवरों में विकसित होते हैं, जो उनके मांस, दूध, अंडे और अन्य उत्पादों के माध्यम से मनुष्य के भोजन तक पहुँचते हैं।

  • एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?

    भारत सरकार ने पशुधन में 37 एंटीमाइक्रोबियल दवाओं पर प्रतिबंध लगाया है और एफएसएसएआई ने खाद्य उत्पादों में एंटीबायोटिक के उपयोग पर सख्त नियम बनाए हैं। जागरूकता बढ़ाना और बेहतर जैव सुरक्षा उपाय भी महत्वपूर्ण हैं।

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